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आज़ादी की चीख (Lament Of Independance)

 

 




सत्तर दशक से ज्यादा हुए ,
मेरी उम्र को ;
इसलिए ,
मेरी आंखे ,
थोड़ी धुंधली हो गई है ।
मगर ,
श्रवण शक्ति अभी भी ,
बहुत तेज है ।
हमेशा से सुनती आई हूँ ,
उनके वादे ,
जो वो तुमसे करते हैं ,
जो मेरी वज़ूद को ,
पुश्तैनी जागीर समझ इस्तेमाल ,
कर रहे हैं ;
जो मुझे लाये थे ,
उनकी आत्माओं तक का ,
अपमान कर रहे हैं ।
मगर ,
मैं तुम्ही लोगों से ,
जो चुपचाप उन मिथ्यावादिओं की ,
आश्वासनों से पेट भरते हो ,
कहती हूँ ,
उन का पेट चीर ,
कच को आज़ाद करो ।



(REALLY WE THE SUBJECT, ARE OPENHEARTED BEYOND LIMIT. EVEN AFTER SEVENTY YEARS, WE SILENTLY FOLLOW, OBEY AND BOW IN FRONT OF OUR SO CALLED LEADERS (BHAGYA VIDHATA). WHY WE ARE SO NAIVE. WHY WE ARE NOT SELECTED CANDIDATES OF CLEAN STATURE. WE ARE SELECTING CANDIDATES OF DARK BACKGROUND WHY? NOBODY IS GOING TO ASK THESE QUESTIONS. WE OURSELVES MUST ASK)
__________

By Rabindranath Banerjee (Ranjan)

 

 


 

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