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दुर्वाशा ( Durvasha )




एकदा,भयंकर क्रोधी मुनि दुर्वाशा,


मन में यह आशा लेकर कि,मर्त्य को---


एकबार फिर से देखेंगे;


स्वर्ग से पृथ्वी पर पधारे !


स्थान कुछ परिचित सा लगा !!!!!


स्मरण हो आया,,,,,


येही वो स्थान है जहाँ,युगों पहले :::::


शकुन्तला को उन्होंने श्रापित किया था /////


तृषित थे,जल आवश्यक था .....


संधान में दृष्टि हर ओर घुमाया !


छि-छि: !!!! इस युग में दुष्यंत-शकुन्तला ------


इतने निर्लज्ज हो गए''''''''


खुले आम नग्न हो गए ? ******


श्राप दूंगा !!!!!


यह क्या प्रभु ???? छि: छि:________


शकुंतला एक ! दुश्यन्त दो !!


युद्ध नहीं,रोष नहीं,ग्लानी भी नहीं ??????


खेत एक,,,एक ही समय,,,,,,


बीज दो ???!!!


इनपर श्राप का क्या असर हो !!??


जिन्हें,पुण्य का लोभ नहीं !


पाप का भय नहीं !!!!!

( WE SHOULD NOT BE JUDGEMENTAL. IT IS PERFECTLY ALL RIGHT. BUT IS IT NOT SADDENING TO WITNESS TODAY'S PDA EVERYWHERE BY OUR YOUNG GENERATION. THEY HAVE TOTALLY FORGOTTEN THAT, PDA LOOSENS THE BOND. EVEN IF THAT IS ACCEPTABLE TO THE MAJORITY, THEN PHYSICAL LOVE CREATES FRUSTRATION WITHOUT BONDING. AND THE MEAN IS TWO TIMING. WHERE FAITHFULNESS IS? WE HAVE TO SEARCH THAT QUICKLY.)
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रबीन्द्रनाथ बनर्जी ( रंजन )