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Couplets-4




(31)
सदा ने पुकारा चल पड़े,सबा ने रोकI थम गए,
'रंजन'यूंही खुद के ज़नाज़े को ढोते चले गए !


(32)
ना आब रही,ना आब का इन्तिज़ार,
दश्ना दे दी कातिल के हाथों में !


(33)
सूनी दुनिया थी मेरी,सुना नशेमन भी मेरा,
अब गुलज़ार है रंज-ओ-गम और बादाख्वारों से !


(34)
उनके कूचे से अब आती है खतरे की बू,
'रंजन' को शेख समझकर पिलाते हैं लोग !


(35)
हर लम्हा दश्ना ले तैआर है वार को,
वो गुजरा कल था ये मौजूदा पल है !


(36)
उनका वो वादा करना तुर्बत पे चरागाँ का,
'रंजन' को है हर लम्हा इंतज़ार-ए-मौत !


(37)
खामोशी का असर नहीं विसात-ए-तकल्लुम क्या,
चश्म-ए-ग़फ़लत नज़रों में वजूद का मतलब क्या !


(38)
नीमबाज़ को मनाना कुछ काम न आया,
वरना 'रंजन' भी आदमी था बहुत काम का !


(39)
उम्र-ए-दराज़ जो मिला था वो गुजरा भी कैसे,
दो ख़त लिखने में,दो इंतज़ार-ए-कासिद में !


(40)
इस अंदाज़-ए-रुखसत को कोई क्या कहे,
फिर मिलने का वादा किया जनाजे पे !

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