Sahitya Sangeet

 

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Couplets Page-13

 




121.
ऐ मुहब्बत आज रोले जी भरके तू भी ,
"रंजन" पे रोने के लिए इक क़तरा भी न छोड़ ।
122.
गैरों ने तुझे अंजुमन आरा बना के छोड़ा,
और "रंजन" , फिर रहे हैं चाकदामन लिए एक दरजी के तलाश में ।
123.
वही हमेशा डूबते हैं ठहरे हुए समंदर में "रंजन",
जिन्हे तूफ़ान को अपने वश में रखने का गुरूर हो ।
124.
ता ज़िंदगी इस अंदेशा पे भागता ही रहा "रंजन",
अपने साये को हमेशा क़ातिल ही समझता रहा ।
125.
"रंजन" आज उसे जी भर भर के दुआएं दिए जा रहा ,
किस तरह उसने उसका हाल पूछ लिया होगा ।
126.
मुहब्बत एक खूबसूरत ख्वाबों का किताबी दुनिया है "रंजन" ,
इस अकलीम में तुम्हे आशिक़ों के लाशों का अम्बोह मिलेगा ।
127.
"रंजन" ये अज़ाब किसी और पे न आये खुदा खैर करे ,
घर के लिए एक उम्र चलते रहे , पता सबने ग़लत बताया ।
128.
ज़िंदगी क्या है ,अश्क़,भूख,ज़फ़ा और चाकदामन "रंजन",
मौत है इन सभी शै का एकदम से परेशान हो जाना ।
129.
"रंजन" के हमदर्द बेशुमार है ,पता है तुम्हे ,
शायद उसके आसपास अदाकार बहूत होंगे ।
130
हम हैं तो खुदा की खुदाई भी है "रंजन",
हम न होते तो उसे पूछता भी कौन ।

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