Sahitya Sangeet

 

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Spirituality

Couplets-5

 




(41)
क्यूँ नहीं होता इस शब् का सहर,
अब इस शहर से गुज़र कर देखेंगे !
(42)
क्या लेके आये थे क्या लेके चला,
तमन्ना था साथ में वही लेके चला !
(43)
इश्क ने ये अदब भी सिखा दिया,
वज्म में देखा उनको आईने में !
(44)
मंदिर मस्जिद देखा वीराने में तो ये समझा,
हम ही तगाफुल नहीं है एक ज़माने में !
(45)
लाख अन्दाम पे नक्श निकाल,
जबाँ ने धोखा दे ही दिया रूबरू !
(46)
पैबंद लगी पैरहन हासिल नहीं तकदीर को,
वो पूछते हैं क्या, 'रंजन' आप छुपे थे कहाँ !
(47)
मुहब्बत को हासिल है गर मंजिल-ए-तगाफुल,
खुदा का रहमत है यारों हम अजनबी ही रहे !
(48)
हमदर्दी की ख्वाहिश अब नहीं रहा गरीब को,
'रंजन' हुआ है माहिर ग़म को उठाने में अब !
(49)
'रंजन' तू बाज़ भी आ इस बदाख्वारी से अब,
हर इक जाम में एक ग़ज़ल डूब जाता है !
(50)
जुबाँ पे न जुम्बिश आई किसी भी सितम पे,
दर्द से सुबकता रहा 'रंजन' का पुर्जा-पुर्जा !

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