Sahitya Sangeet

 

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Couplets-7

 

 



(61)
रहगुज़र कितना था ता उम्र ना गुजरा,
मंजिल मिली आखिर मर्ग के आगोश में !
(62)
ग़म की काली रात में हर चराग गुल कर दो,
दिल ही बहुत काफी है इक तनहा जलने को !
(63)
ज़ख्मों पे टाँके लगाना बंद कर अये चारागर,
एक ज़ख्म सीता है और सौ लगा जाता है !
(64)
वही अक्सर ठहरे पानी में डूब जाया करते हैं,
जो शनावर दरिया में बेबाक तैरा करते हैं !
(65)
किस कदर कातिल ने दौडाया है मुझको,
अब साए से भी भागा फिरI करता हूँ मैं !
(66)
हर गुल के चेहरे पे ये मातम क्यूँ छाया है यारों ,
बुलबुल ने आखिर ऐसा क्या कहकर निकल लिया !
(67)
तस्वीर में दिल पे लगे ज़ख्मों को क्या तलाशना ,
हिम्मत हो तो कभी आ जाना ज़बानी सूना देंगे !
(68)
ज़ख्म दिया और मरहम भी,ये क्या बात हुई ,
आज फिर कातिल के हक में फैसला होना है !
(69)
सम्हालने वाले हाथों में भी अक्सर दशना देखा,
'रंजन' ये दो मुखवटे वालों में जिया करता था !
(70)
'रंजन' खामोश आसमान को एक तक देख रहा है,
न जाने क्यूँ आसपास आंसुओं का दौर थमा ही नहीं !

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